Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 15, 2011

ओस-सा-मन


1-शैल अग्रवाल [सम्पादक लेखनी डॉट नेट ]

1

फिर आए ये

भोजपत्र आस के

हमारे नाम।

2

पीत पर्ण जो

झरने दो उनको

रोको ना आज

3

ओस-सा-मन

हवा की छु्अन से

सिहरा गात।

2-डॉ हरदीप सन्धु

1

सुन्दर पात

आपकी छुअन से

सुंदर और !

2

नर्म -नर्म से

हरीतिमा बिखेरें

ये डाल-डाल !

3

पात झरे तो

यूँ बिखर जाएँगें

गली -गली में !

4

सूखे पात तो

फिर से फिर होंगे

हरे कचूर

5

ओ मन तेरा

मुरझा जाए कभी

देखो पात को !

-0-


Responses

  1. सुन्दर हाइकु…बधाई…।

  2. ओस-सा-मन
    हवा की छु्अन से
    सिहरा गात।

    ओ मन तेरा
    मुरझा जाए कभी
    देखो पात को !

    शैल जी और हरदीप जी के हाइकु बहुत खूबसूरत हैं …बहुत -बहुत बधाई ……

  3. ओस-सा-मन
    हवा की छु्अन से
    सिहरा गात।

    ओ मन तेरा
    मुरझा जाए कभी
    देखो पात को !

    SUNDAR HAIKU BAHUT-BAHUT BADHAI..


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