Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 12, 2011

कांपी धरती


1   कांपी धरती
  पिघला आसमान
  मूक इंसान ।

2  टूटा घरौंदा
 बिखरा है सामान
 कैसी पहचान ।

3    रौंदी धरती
  भूले हैं परिणाम
  अब हैरान ।

4     वीरान बस्‍ती
   सहमी है धरती
   ये है प्रगति ।

 5  गीत भूल
  मीलों तक खमोशी
  सुनाती दास्ताँ ।

सीमा स्‍मृति


Responses

  1. एक मार्मिक घटना की सटीक अभिव्यक्ति…

  2. sochne ke liye majboor kr dene vaale haiku…

  3. कटु सत्य ….इंसान सोचे तब न अपनी मनमानी करता है लेकिन धरती एक बार काँप जाए तो सब तहस- नहस होने में देर नहीं लगती ….सार्थक हाइकु के लिए बधाई ….


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