Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 25, 2011

छाई घटा


1

छाई जो घटा

मन हुआ व्याकुल

देख झोंपड़ी

2

नीला गगन

जब मेघों से ढका

खूब है रोया

3

प्यासी धरती

मस्त हुई नहाके

फैली सुगन्ध

4

ओढ़े हैं खेत

हरी-हरी चादर

सपनों-भरी

-मुमताज-टी एच खान

 


Responses

  1. सुन्दर तस्वीर के साथ बहुत ही शानदार हाइकु लिखा है आपने! खासकर ये पंक्तियाँ
    नीला गगन
    जब मेघों से ढका
    खूब है रोया….
    बहुत अच्छी लगी!

  2. Prakrati ka bahut acha chitran hua in haikoo men…….bahut-bahut badhai…

  3. मुमताज टी एच खान के हाइकु कोमलता से ओतप्रोत हैं ।”नीला गगन /जब मेघों से ढका /
    खूब है रोया/ में चित्रण बहुत प्रभाव्शाली है । सन्धु जी और काम्बोज जी की यह टीम बहुत अच्छा लिख रही है । बहुत बधाई !

  4. kya baat hai bhige maousam ke bhige haiku .man bhigogaye
    ओढ़े हैं खेत
    हरी-हरी चादर
    सपनों-भरी
    kamal ka laga chitr sa ban gaya aankhon me
    rachana

  5. प्रकृति के ख़ूबसूरत शब्द चित्र… कहीं बादलों के आने से ख़ुशी है, सपनों की हरी भरी चादर है, मस्त सुगंध है तो कहीं झोंपड़ी की चिंता है या अपना अस्तित्व खो जाने के दुःख में रोता हुआ नील गगन… ग़म और ख़ुशी दोनों पहलुओं को बयान करते हुये सभी हाइकू एक से बढ़ कर एक हैं…

  6. चिन्ता..बेबसी..खुशी..सब कुछ वर्णन कर गए ये हाइकु…..

  7. ओढ़े हैं खेत
    हरी-हरी चादर
    सपनों-भरी

    ओढ़े हैं खेत
    हरी-हरी चादर
    सपनों-भरी

    ये दोनों हाइकु बहुत मन को भाए ……वैसे सभी अच्छे हैं …मुबारक सुन्दर लेखन के लिए …

    डा. रमा द्विवेदी

  8. मौसम के अनुकूल हाइकु, बहुत सुन्दर, बधाई.


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