Posted by: हरदीप कौर संधु | जुलाई 14, 2011

मेरे सात जनम – समीक्षा


   

     

 रचनाकार- श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु


         

       

                 समीक्षक -डॉ  हरदीप कौर सन्धु 

                           

मेरे सात जनम ( हाइकु संग्रह ) : रामेश्वर काम्बोज हिमांशु  ;पृष्ठ  : 128 ,सज़िल्द मूल्य :160 रुपये ; संस्करण : 2011; प्रकाशक -अयन प्रकाशन, 1/20 महरौली , नई दिल्ली–110 030


  रामेश्वर कम्बोज हिमांशु जी हिन्दी जगत के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार हैं । अलग-अलग मापदण्ड  द्वारा कोई श्री हिमांशु जी को श्रेष्ठ लघुकथाकार कहता है तो कोई   आपका नाम गीत -नवगीत , बाल-साहित्य , व्यंग्य तथा हाइकु लेखन के साथ जोड़ता है । परन्तु मेरी नज़रों में श्री हिमांशु  जी एक व्यापक संस्था का नाम है , जहाँ इन सभी विधाओं में केवल लिखा ही नहीं जाता ;बल्कि लिखना सिखाया भी जाता है । मैं अपने आपको भाग्यशाली मानती हूँ ; क्योंकि मुझे इस संस्था से जुड़ने और बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला है ।

   आज की तारीख में श्री हिमांशु  जी एक सच्चे हाइकु प्रेमी हैं । आपने स्वयं अव्वल श्रेणी के हाइकु लिखने के साथ-साथ यह हाइकु स्याही और कई कलमों में भर दी है । हाइकु लिखने की यह अदभुत कला सिखाकर कई नए हाइकुकार पैदा किए हैं ;जो हिन्दी साहित्य के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ।

   ‘ मेरे सात जनम’ को पढ़कर लगता है कि इतने कम शब्दों में भाव और शिल्प की जो विशिष्ट प्रस्तुति इस काव्य-संकलन में मिलती है ,वह इसे बेजोड़  बना देगी  । आप यह पुस्तक एक बार पढ़कर बंद नहीं कर  सकते । जितनी बार भी पढ़ोगे, आप गहरे और गहरे मन के कूप में उतरते चले जाओगे । हिमांशु जी ने यह पुस्तक पाठकों के हाथ में देकर सात जन्मों का प्यार अपनी झोली में पाया है । पुस्तक पढ़कर मैंने संग्रह के शीर्षक ‘मेरे सात जनम’ का रहस्य  जाना कि आपने इसी जन्म में सात जन्मों के समान जी लिया है । जिन्दगी को जी भर के देखा और सम्पूर्णता से  जिया है। 

 ‘मेरे सात जनम ‘  7 खण्डों में विभाजित है जिस में कुल मिलकर 494 हाइकु शामिल किए गए हैं ।

1 . पहला खण्ड ‘उजाला बहे’ में 28 हाइकु हैं । यह खण्ड आलोक को समर्पित है । उगते  सूर्य की ऊष्मा जैसी जिन्दगी की कामना की है हिमांशु जी ने यहाँ । हाइकु कैसे हों ? के बारे में हिमांशु जी का मानना है कि ….  

पके आम से / सहज चुए रस / हाइकु वैसे ( पृष्ठ  25 )

अर्थात  हाइकु में सहजता से जो बात अभिव्यक्त हो ….जो रस नि:सृत हो , वही सही अर्थों में हाइकु कहलाता है ।                               

इस  खण्ड  में  अपने मन को रौशन करने की कामना करता कविमन लिखता है ..

रौशनी बसी / मन नन्हे शिशु की / बिखरी हँसी ( पृष्ठ  21 )       

 ऐसी ख़ुशी से चेहरा ही नहीं खिलता बल्कि हमारा तन-मन नन्हे की किलकारियों  जैसे तरोताज़ा भी हो जाता है ।

एक तरफ जहाँ घर-घर में मोह – ममता की महक बिखेरने की तमन्ना रखता यह खूबसूरत हाइकु लिखा है …

दीप प्रेम का / हर घर में जले / अँधेरा टले ( पृष्ठ  24 )

वहाँ दूसरी ओर हर आँगन  उजाला ही उजाला फैलाने की बात करता कवि लिखता है …

अँधेरा हटा / उगाएँगे सूरज / हर आँगन ( पृष्ठ  25 )

2.दूसरा खण्ड ‘ नभ के पार ‘ में 23 हाइकु हैं । इस खण्ड में हिमांशु जी ने  जिन्दगी में निरन्तर चलते रह कर  जिन्दगी की बाज़ी जीतने की कला सिखाते हुए हमें जुझारू बनने की प्रेरणा दी है ….

मैं नहीं हारा/ है साथ न सूरज/चाँद न तारा ( पृष्ठ  27 )

काँटे जो मिले / जीवन के गुलाब/उन्हीं में खिले ( पृष्ठ  27 )

दुःख नदी के / पार अगर जाना / सीखो मुस्काना ( पृष्ठ  28 )

पंखों में बाँध/ सिसकते मन को / उड़ा पखेरू ( पृष्ठ  31 )

प्यार के बिना जीवन रसहीन है । प्यार जीवन की फुलवारी में वह फूल है जिसके खिलने से जीवन महक उठता है ।ऐसे प्यारे जीवन की महक पाठकों के मन -मन्दिर में हिमांशु जी कुछ ऐसे कहकर बिखेरते हैं …..

प्रेम जो मिला / मुरझाया जीवन / फूल-सा खिला (पृष्ठ  28 )

दोनों का प्यार / खुशबू -सा महके / नभ के पार ( पृष्ठ  30 )

3. ‘तीसरा खण्ड ‘ पलकों में सपने सबसे विस्तृत खण्ड है जिस में कुल 207 हाइकु लिखे गए हैं । मैं इस खण्ड का नामरिश्तों के नाम रखना चाहूँगी ;क्योंकि यहाँ दर्जनों  हाइकु  एक से एक अनूठे भाव लिए हुए , रिश्तों की पावन चाँदनी बिखेरते जीवन को दूध -सा दूधिया करते हैं । 

यहाँ हाइकु एक स्त्री को समर्पित हैं । कभी वह स्त्री माँ के रूप में , कभी पत्नी , प्रेमिका , बहन, बेटी या दोस्त के रूप में रूपवान होती है ।

सबसे पहले तो मैं कवि द्वारा बताई जीवन की परिभाषा की बात करने जा रही हूँ । बहुत ही खूबसूरत अल्फाज में पिरोकर यह हाइकु ” जीवन क्या है ? बताता है …

जीवन – घट / जब जितना ढरे / उतना भरे ( पृष्ठ  38 )

व्याकुल मन /दो पल का मिलन / यही जीवन ( पृष्ठ  37 )

आँखों से पिया/जीवन-अमृत जो / बरसों जिया ( पृष्ठ  61 )

ओर न छोर/ कभी हाथ न आई / जीवन-डोर ( पृष्ठ  61 )

स्त्री रूप में से मैं पत्नी रूप की बात सबसे पहले करूँगी । यहाँ कविमन की मुराद पलकों पे सजाए सुन्दर सपनों को जीवन संगिनी के साथ मिलकर साकार करने तथा जीवन को सम्पूर्ण बनाने की है ।

जीवन संगिनी के साथ हुई पहली मुलाकात को शब्दों में पिरोए हाइकु फूलों की  पँखुरियों जैसे मुलायम रेशमी अहसास जगाते  मन को  विस्मय की अवस्था में ले जाते हैं और यही  कवि की कुशलता को दर्शाता है …

पहला स्पर्श / रोम-रोम बना है / जल-तरंग (पृष्ठ  33 )

माथा जो छुआ / हृदय -सागर में / जाने क्या हुआ (पृष्ठ  36 )

छूकर माथा / स्नेहिल अधरों से / लिख दूँ गाथा (पृष्ठ  45 )

हिमांशु जी ने अपनी कल्पना और लेखनी के बलबूते सौंदर्यशास्त्र को अपने हाइकु में ढालते हुए अपनी प्रियतमा के सौन्दर्य को शृंगार रस की चाशनी में पागकर प्रस्तुत किया है । यह हाइकु पढ़ते हुए लगा जैसे कोई सुन्दरता की प्रतिमूर्ति मेरे सामने आकर बैठ गई हो और मैं उसे टकटकी लगाए न जाने कितनी देर निहारती रही ।

चाँद निचोड़ा / और दे दिया वह / रूप तुमको ( पृष्ठ  44 )

मुझे तो भाया / सादगी में नहाया / रूप तुम्हारा ( पृष्ठ  44 )

नभ का चाँद / लेकर क्या करना / तुम सामने (पृष्ठ  44 )

अपनी अर्धांगिनी को पाकर कवि धन्य हो गया ….

आए जो आप / जनम-जनम के / मिटे संताप (पृष्ठ  32 )

तुम्हारा आना / आलोक के झरने / साथ में लाना ( पृष्ठ  32 )

तुम्हारे हाथ / सौंप दिया हमने / साँसों का साथ ( पृष्ठ  32 )

बिटिया को आशीष देता हुआ हाइकु पढ़कर ऐसे लगा जैसे मेरे पिता जी मेरे सिर पर  हाथ रखे हुए हों और मेरी ऑंखें नम हो उठीं ….

अँजुरी भर / आशीष तुम्हें दे दूँ / आज के दिन ( पृष्ठ  33 )

जब बेटी अपने पिता से और बहन अपने भाई से शादी उपरान्त दूर चली जाती है , वह उसके हर सुख की कामना करता हुआ कहता है …

हमें चाहिए / जीवन में केवल/सुख तुम्हारा ( पृष्ठ  55 )

मगर बिटिया / बहन का दूर जाना तब उसको उपराम करता है जब कोई कष्ट आ घेरता है । बिटिया / बहन के दुःख को अपने-आप में महसूस करते हिमांशु जी लिखते हैं …

परदेस में / उठी तुमको पीर/ मैं था अधीर ( पृष्ठ  35 )

चुप रहोगे / जान लेंगे फिर भी / दर्द तुम्हारा ( पृष्ठ  61 )

बेबस हुए / ऑंखें डबडबाईं / याद जो आई ( पृष्ठ  45 )

पी लेंगे हम/अमृत समझकर / दुःख तुम्हारे ( पृष्ठ  53 )

अपनी मन की आँखों से कविमन जब अपनी बिटिया/बहन की आँखों में अश्रु देखता है तो व्याकुल हो उठता है …

ये गीली ऑंखें / देख तुम्हारी हम/ जीभर रोए ( पृष्ठ  65 )

तेरी रुलाई / पोर-पोर में खुभी / कील की नाई ( पृष्ठ  65 )

नयन-जल / पिघला गई कोई / पीर अतल (पृष्ठ  37 )

मोती न सही/है बहुत कीमती/आँसू तुम्हारे ( पृष्ठ  39 )

तुम्हारे दुःख / टीसते दिन-रात /खूब रुलाते( पृष्ठ  59 )

मुझे वर दो/ आँचल में अपना / दुःख भर दो ( पृष्ठ  41 )

तुम्हारा दर्द / अँजुरी से पी लूँगा / युगों जी लूँगा ( पृष्ठ  41 )

प्यार एक खुबसूरत जज्बा है जिसका सिर्फ अहसास  किया जा सकता है । शब्दों में बयान करना असम्भव  है । लेकिन प्यार की हाइकु कलम से इसको  सम्भव  बनाना हिमांशु जी को आता है …

दो घूँट प्यार / किसी का है जीवन / दे दें जो आप ( पृष्ठ  42 )

अँधेरी खाई / पार हम करेंगे / प्रेम भरेंगे ( पृष्ठ  48 )

मोह के तार / बाँधे बाहुपाश में / सारा संसार ( पृष्ठ  54 )

मधुर प्यार / महसूसा मन में / हज़ारों बार ( पृष्ठ  59 )

माँ एक ऐसा शब्द है जिसके नाम में ही सुकून छुपा होता है, प्यार छुपा होता है। माँ का दर्जा हमारे  जीवन में सबसे ऊँचा है । माँ को सबसे बड़ा तीर्थ कहकर हिमांशु जी ने सम्मान दिया है …

पूजा न जानूँ / तीरथ किया नहीं / तुम्हीं को  मानूँ ( पृष्ठ  68 )

तेरा आँचल/ है बहुत शीतल / जैसे संदल ( पृष्ठ  44 )

तेरी गोद में/ झँपे नयन, सिर / छुपा सो गई ( पृष्ठ  72 )

सुख जो पाया/माँ की गोद में सिर्फ /था मिला कभी ( पृष्ठ  73 )

पुस्तक को पढ़ते हुए महसूस किया कि हिमांशु जी का मन फूल-सा कोमल है । किसी को दुखी देखकर खुद पीड़ित हो उठते हैं । अगर ऐसा न होता तो यह हाइकु आपके लेखन का हिस्सा न बन पाते ….

रड़कें नैन / छिन गई निंदिया / मन का चैन ( पृष्ठ  72 )

चुप्पी तुम्हारी / बढ़ा जाती दिल की / रोज़ बेचैनी ( पृष्ठ  64 )

दुःख की नदी / डूबकर पार की / तैर न सके ( पृष्ठ  64 )

हिमांशु जी के हाइकु बहु-अर्थी होते है । इनको हम जीवन की किसी भी अवस्था के अनुसार किसी पर भी लागू कर सकते हैं । यह तो पाठक की सोच पर है कि पढ़ते समय वह हाइकु किसको मुखातिब होकर पढ़ रहा है । मिसाल के तौर पर…

पिछले जन्म / लाखों मोती लुटाए/ आप हैं पाए ( पृष्ठ  62 )

दो नहीं थे / सदा एक मन थे / हम दोनों के ( पृष्ठ  64 )

गले मिले तो/मिट जाएँगे दुःख/जन्म-जन्म के ( पृष्ठ  66 )

4 .चौथा खण्ड भीगे किनारे‘ है जिस में 84 हाइकु दर्ज किए गए हैं । रिश्तों की कद्र करने वाला हिमांशु प्रकृति के प्रति अटूट प्यार रखता है ।यहाँ उनकी कलम हमें सृष्टि-सौन्दर्य का अनुभव कराती है। इस खण्ड के सभी हाइकुओं में  प्रकृति के नाना रूपों के मनोहर चित्रों के साथ मानवीय संवेदना की गूँज भी सुनाई देती है । इन हाइकुओं को पढ़ते मैं तो सुन्दर वादियों में पहुँच गई जहाँ सूरज , चाँद और तारों को उन वादियों में उतरा देखकर मैं तो मुग्ध हो गई …

बजा मांदल/ घाटियों में उतरे / मेघ चंचल ( पृष्ठ  76 )

सर्दी की धूप / उतरी आँगन में / ले शिशु – रूप ( पृष्ठ  74 )

फैली चाँदनी / धरा से नभ तक/जैसे चादर ( पृष्ठ  75 )

आँचल खींचे / कभी अँखियाँ मींचे / चंचल चाँद (पृष्ठ  87 )

नीलम-झील /लहरों की गोद में/ किलके चाँद ( पृष्ठ  87 )

प्रकृति जहाँ सुंदर है,वहाँ कभी-कभी क्रूर रूप भी धारण कर लेती है । कवि की कलम हमें प्रकृति का दूसरा रूप कुछ ऐसे दिखलाती है …

बूढ़ा मौसम / लपेटे है कम्बल / घनी धुन्ध का ( पृष्ठ  78 )

कोहरा घना /दिन है अनमना / काँपते पात ( पृष्ठ  77 )

सूझे न बाट/ मोतियाबिन्द ऑंखें / जाना किधर ( पृष्ठ  79 )

चट्टानें तपीं/ लोहे की भट्टी-जैसी/पिघली धूप ( पृष्ठ  82 )

घायल पेड़ / सिसकती घाटियाँ / बिगड़ा रूप ( पृष्ठ  83 )

आखिर में मैं इस खण्ड के नाम ( भीगे किनारे ) के महत्त्व को दर्शाते हाइकु की बात करना चाहूँगी, जिनको पढ़कर मेरा मन द्रवित हो गया ….

लहरें उठीं / तर हो गई धारा/ भीगे किनारे ( पृष्ठ  81 )

शीतल धारा/चूमती ही जा रही/प्यासा किनारा (पृष्ठ  81 )

5 .पाँचवाँ खण्ड ‘ भरी भीड़’ में है जिस में 79 हाइकु हैं । दुनियावी सच को सच के तराजू में तोलकर व्यक्त करता कवि पाठकों के मन में अमिट छाप छोड़ेगा , यह मेरा दावा है …

उमर ढली / भीतर की कालिमा/कभी न धुली ( पृष्ठ  100 )

मानव कम/धनपशु अधिक /बांटे जहर (पृष्ठ  105 )

नभ ऊपर / फुटपाथ बिस्तर / गुम ईश्वर ( पृष्ठ  106 )

भरी भीड़ में अपने हर सुख की आहुति देने वाली नारी को आखिर कौन -सा तमगा मिलता है ? उसके निज जीवन के कटु अनुभवों को व्यक्त करते ये हाइकु ….

प्यार न पाए/सुख-चैन लुटाए/ यही है नारी ( पृष्ठ  100 )

पीकर दर्द/अग्नि -पथ पर भी/नारी मुस्काए ( पृष्ठ  101 )

दो घर मिले/फिर भी बेघर ही/हो जाती नारी (पृष्ठ  107 )

6 . छठा खण्ड ‘यही सच है’ में केवल 24 हाइकु हैं मगर हर एक हाइकु पर पृष्ठ  के पृष्ठ  लिखे जा सकते हैं । यहाँ  कवि जीवन का कड़वा सच  केवल सतरह वर्णों में बाँधकर हमें दिखता है ….

प्यार ही बांटे/ चुभे जीवन भर/फिर भी काँटे (पृष्ठ  107 )

हमको मिले / अधूरे ही सपने/न थे अपने (पृष्ठ  108 )

सच है यही / जीवन से गिला कि/ कुछ न मिला ( पृष्ठ  109 )

ज़हर-बुझे / हज़ारों बाण चुभे/फिर भी जिन्दा (पृष्ठ  109 )

बन जाती है और कभी-कभी सर्दी की धूप जैसी …वाह रे कविमन कितनी ऊँची है तेरी सोच की उडान। तेरे मन की परतें जानना हर किसी के वस की बात  नहीं है।

निभाए नहीं / जुते हुए बैल – से/ रिश्ते हैं सहे (पृष्ठ  110 )

7 . सातवाँ खण्ड ‘ सीपी के मोती ‘ में 49 हाइकु रूपी अनमोल मोती बिखरे हुए  हैं ।पुस्तक का यह आखिरी खण्ड पढ़कर मेरा मन इन मोतियों की माला अपने मन के गले में डालने के लिए उत्सुक हो उठा ।असल में ये सीपी के मोती कोई और  नहीं बल्कि कभी माँ है , कभी बहन और कभी बेटी  है ।कभी बिटिया मन के आँगन में नन्ही चिड़िया बन फुदकती है , कभी फूलों की फुलवारी ….

मन-आँगन / चिड़िया -सी चहके / प्यारी बहना (पृष्ठ  117 )

प्यारे हैं रूप / माँ,बेटी,बहिन/ सर्दी की धूप (पृष्ठ  116 )

इससे बड़ा / जग में न था,न है/ कोई गहना (पृष्ठ  117 )

घर की शोभा / वेद- ऋचाओं जैसी / होती बेटियाँ (पृष्ठ  119 )

बेटी जो मारे/ सौ तीरथ उसको/नहीं उबारें( पृष्ठ  120 )

  मेरे सात जनम में लिखे हाइकु जहाँ पुस्तक के नाम के साथ इंसाफ करते हैं ;वहाँ यह भी प्रमाणित करते हैं कि रामेश्वर कम्बोज हिमांशु शब्दों का  जादूगर है  ..एक सफल हाइकुकार है ,जिसने शब्दों के कैमरे में जीवन को कैद करके   हमारे सामने पेश किया है । लगता है कि किसी गैबी शक्ति ने उनसे यह हाइकु लिखवाएँ हैं.. पाठकों की झोली मेरे सात जनम जैसा हाइकु संकलन डालने के लिए ! यहाँ मैंश्रीमती वीरबाला काम्बोज जी का ज़िक्र करना नहीं भूलूँगी ,जो हिमांशु जी के हाइकुओं की प्रथम श्रोता रहीं हैं ,जिस कारण  यह हाइकु संकलन इतना अनूठा – अनछुआ बन गया । हिमांशु जी की कलम को मेरा शत -शत नमन !


Responses

  1. हिमांशु जी के संकलन की इतनी सुन्दर और विस्तृत समीक्षा के लिये धन्यवाद!

  2. हिमांशु जी की बहु आयामी प्रतिभा को हरदीप जी ने एकदम सही नाम दिया है “एक व्यापक संस्था” हिमांशु जी कथाकार हैं, गीतकार हैं, हाइकू कार हैं, व्यंग्यकार हैं, बाल साहित्यकार हैं… मतलब यह कि वह अपने आप में साहित्य जगत का एक मजबूत स्तम्भ हैं. हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय हैं, सराहनीय है. उनको शुभकामनाओं सहित सादर अभिनन्दन…

  3. आदरणीया हरदीप सन्धु जी,
    पुस्तक की समीक्षा इतनी प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत
    करने के लिए बहुत बहुत बधाई| ‘मेरे सात जनम’
    रुपी समंदर से आपने जिन जिन मोतियों को पेश किया
    वे बेमिसाल हैं|हिमाशु सर के इतने सारे हाइकु एक ही
    जगह पर पढ़ने को मिलेंगे यह बहुत अच्छा है|
    जीवन पथ की सहगामिनी श्रीमती वीरबाला काम्बोज जी का
    ज़िक्र कर के आपने समीक्षा को पूर्णता प्रदान की है|
    शुभकामनाऔं के साथ
    सादर
    ऋता शेखर’मधु’

  4. बहुत खूब हरदीप जी…एक अमूल्य संकलन की बहुमूल्य समीक्षा के लिए मेरी बधाई स्वीकारें…।
    आपने शुरुआत में जो लिखा है- परन्तु मेरी नज़रों में श्री हिमांशु जी एक व्यापक संस्था का नाम है , जहाँ इन सभी विधाओं में केवल लिखा ही नहीं जाता ;बल्कि लिखना सिखाया भी जाता है । मैं अपने आपको भाग्यशाली मानती हूँ ; क्योंकि मुझे इस संस्था से जुड़ने और बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला है ।- ये तो लग रहा है आपने मेरे मन की बात कह दी…। आज की इस मतलबपरस्त दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम हैं, सो उन्हें नमन…।
    आदरणीया वीरबाला जी का जिक्र करके आपने इस समीक्षा को पूर्णता प्रदान की है, ऐसी सहधर्मिणी को भी प्रणाम…।
    आदरणीय काम्बोज जी ऐसे असंख्य संकलनों से पाठकों की झोलियाँ भरते रहें, ऐसी मेरी शुभकामना है…।

    प्रियंका

  5. समीक्षा के द्वारा पूरी पुस्तक के ही दर्शन करवा दी आपने

    पुस्तक के प्रकाशन पर कम्बोज जी को बधाई

  6. Hardeep Ji namaskar,
    Sab se pehle “Mere saat janam” ke roop mein is anmol khazane ki, itne sunder aur pirbhawshali dhang se sameeksha karne ke liye hardik badhai sweekar karein. Ab rahi baat aadarniye Himanshu Bhaisahab ki,to is vishay mein to hum itna hi kahenge ki jis pirkar chamakte hue dhruvtare ko paa kar, yeh gagan garweela hai, usi pirkar aadarniye Himanshu Bhaisahab ko paa kar, yeh saahitya jagat garweela hai. Hamari yeh shubh kaamna hai,ki aise anmol khazanon ke roop mein, hum sab ko Bhaisahab ka aashirwaad sada milta rahe. Saath hi Bhaisahab ki janam janamantar ki saathi smt.Veer Bala Ji ko bhi koti koti naman.

  7. डा.हरदीप जी,
    हिमांशु जी द्वारा रचित ‘मेरे सात जनम’ हाइकु संग्रह की आपने बहुत विस्तृत,सारगर्भित और सटीक समीक्षा आपने की है इससे अच्छी समीक्षा और कोई कर ही नहीं सकता क्योंकि आप इस क्षेत्र की अधिकारी हैं …आपकी पैनी और पारखी नज़रों से कुछ छूटा नहीं है …आपका एक -एक शब्द सही है। हिमांशु जी के लिए मैं इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि वे एक सहृदय इंसान हैं जो दूसरों को आगे बढ़ाने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं बिना किसी अपेक्षा के ! आधुनिक दौर लपकने का दौर है जब अधिकतर लोग अपने मतलब के लिए ही प्रयास करते हैं ऐसे समय में भी कोई इंसानियत को कायम रखे यह काबिले -तारीफ है। निश्चित ही उनकी धर्म पत्नी का स्नेहिल हृदय का योगदान है …ऐसा मेरा विश्वास है। हम प्यार में पगे सरस जोड़ी को शत-शत नमन करते हैं और निवेदन करते हैं कि हम जैसे अनगढ़ लेखकों का हिमांशु जी सदैव मार्ग दर्शन करते रहें और अपनी ऐसी अनेक कृतियों से पाठकों की झोली भर दें। मैंने भी आपका यह हाइकु संग्रह पढ़ा है …हरदीप जी की बात अक्षरस: सत्य है…खूबसूरत संग्रह के प्रकाशन के लिए ढ़ेर सारी बधाई व शुभकामनाएँ……सादर…

  8. हिमांशु जी के सद्य प्रकाशित हाइकु संग्रह ‘ मेरे सात जनम’ की समीक्षा देख-पढ़कर मन को बहुत अच्छा लगा। मैंने यह संग्रह पढ़ा है। आपने हिमांशु जी और उनके हाइकु के बारे में जो लिखा है, मैं उससे शत-प्रतिशत सहमत हूँ। हिमांशु जी नि:सदेह अपने आप में एक संस्था हैं। इस उम्र में भी वह इतने सक्रिय और परिश्रमी हैं कि अच्छे अच्छे युवाओं को मात देते हैं। मन से साफ़, वाणी से साफ़, दृष्टि से साफ़, व्यवहार में साफ़ एक ऐसे सृजनधर्मी कि हर क्षेत्र में उनमे कुछ न कुछ सीखने को मन लालायित रहता है। आपने सही लिखा है कि वह शब्दों के जादूगर हैं, गद्य हो या पद्य, दोनों में गहन रचनात्मकता अपनी पूरी कलात्मकता के साथ दृष्टिगोचर होती है। इस संग्रह के हाइकु नि:संदेह अनूठे और अनछुए हैं और अपने भीतर ‘गागर में सागर’ जैसा भाव-अर्थ समेटे हुए हैं। एकल हाइकु संग्रहों में ‘मेरे सात जनम’ एक उल्लेखनीय और संग्रहणीय कृति है। हाइकु लेखन के क्षेत्र में आने वाली नई पीढ़ी इस पुस्तक से बहुत कुछ सीख सकती है।

    के

  9. हरदीप जी आपने शब्दों की गंगा बहा दी जिसमे भावों के रत्न भरें हैं .सही है हम सभी ने हिमांशु जी से कुछ न कुछ सीखा है .मेरे सात जन्म कोसभी सात जन्मों तक याद रखेंगे .आपने पुस्तक के बहुत से पहलुओं पर प्रकाश डाला है .अब तो मुझे लगने लगा है कि मैने पुस्तक पढ़ी है..
    हाँ आपनेश्रीमती वीरबाला काम्बोज जी का नाम लिख क्र आपने मुझे अभिभूत कर दिया .एक स्त्री कि मूक तपस्या को एक स्त्री ही समझ सकती है .
    हिमांशु जी की पुस्तक अत्यंत उत्तम है .आपने जो लिखा है उसको पढ़ कर लगा कि हिमांशुजी ने जीवन के हर पहलुओं को रच रच के लिखा है .
    इतनी सुन्दर पुस्तक का इतने अच्छे तरीके से परिचय कराने के लिए आपका धन्यवाद .
    और हिमांशु जी को मेरे सात जनम पुस्तक के रूप में हम सभी को इतना अमूल्य उपहार देने के लिए धन्यवाद
    रचना


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