Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 11, 2011

धूप में बीते पल


1-के0 एल0 दिवान , हरिद्वार

1

तेरी हँसी की

धूप में बीते पल

खिले गुलाब     

2

बोले ये मन

तू शम्मा बन जल

हर ले तम     

3

गाता है मन-

नेह नदिया बन

प्यासे हैं जन     

4

‘पक्षी -सा उड़’-

ऐसा कहता मन

नाप गगन    

5

सच तो ये है-

चुभती किरचों-सी

टूटी उम्मीदें   

6

हैं नादान ये

रोशनी की खोज में

आग बाँटते   

7

देखा तुझे तो

लगा ,गुलाब खिला

काँटों के बीच  

-0-

2-लाल बिहारी लाल ( दिल्ली)


1.कर्म का फल
आज नहीं तो कल
मिले ज
रूर।
2
वृक्ष महान
दीन
दुखी सबका
करे कल्याण।
3
प्रकृति हारी
प्रदूषण का जो

संकट भारी।

-0-


Responses

  1. पक्षी -सा उड़’- / ऐसा कहता मन / नाप गगन — मन पक्षी ही तो है, इसकी कल्पना की उड़ान गगन को नाप सकती है

    सच तो ये है- / चुभती किरचों-सी / टूटी उम्मीदें — सही लिखा है, टूटी उम्मीदें किरचों सी ही तो चुभती हैं

  2. ‘पक्षी -सा उड़’-
    ऐसा कहता मन
    नाप गगन
    nai peedi ki paribhasha
    achha laga
    .कर्म का फल
    आज नहीं तो कल
    मिले जरूर।
    sach hai

  3. सच तो ये है-
    चुभती किरचों-सी
    टूटी उम्मीदें …

    अनोखा…


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