Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 24, 2011

ताँका-4


1–  डॉ जेन्नी शबनम

1    

नन्ही -सी परी
लिये जादू की छड़ी
बच्चों को दिए
खिलौने और टॉफी
फिर उड़ वो चली!

2

उनके हाथ
माँझा और पतंग
बच्चे चहके  
सब खूब मचले
जब उड़ी पतंग!

3

उछलें- कूदें
बड़ा शोर मचाएँ
ये नन्हें बच्चे
राज दुलारे बच्चे
ये  प्यारे-प्यारे बच्चे! 

4
दुनिया खिले
आसमान चमके
चाँद तारों -से,
घर अँगना सजे
छोटे-छोटे बच्चों से!

5
प्यारी बिटिया
रुनझुन नाचती
खेल दिखाती
घर-आँगन गूँजे
अम्माँ-बाबा हँसते!

-0-

2-रेखा रोहतगी                 

1

हवा का झोंका 

बन के आए खुशी

दे गई  धोखा

पहले घबराई

फिर समझ पाई।

2

दादा का पद

पोता-पोती आके दें

ऊँचा हो कद,

रिश्तों की यह हद

बेहद खूबसूरत !

3

 दूब पे बूँद

 नाज़ुक ज़िन्दगी -सी

 निकले धूप

जाने खो जाये कहाँ

न मिले यहाँ, न वहाँ 

4

 उदासी बने

 जब उदसीनता

 इससे पूर्व

 मन का द्वार खोलो

सुनो! कुछ तो बोलो

5

जिनका दावा

सबको पहचाने

 जग को जाने 

वे निज अस्तित्वार्थ

 सबका मुँह ताकें

6

अहम अपना

पल -पल पलता

चोट दे के भी

चोट खाने से यह

हर वक़्त डरता

7

चन्दा-मछरी

 गगन-सागर में

 तैरती जाए

 सूरज मछुआरा

 देखते छुप जाए

8

तारों की छाँव

लाडली डोली चढ़े

अँसुवन के 

हरसिंगार झरें

 मन सुगन्ध भरें

9

श्यामा तुलसी

सहमी आँगन में

देख कैक्टस

सजता बैठक में

झरते सावन में

10

उपवन में

होते हैं फूल-काँटे

सोचो मन में,

 सुख औ’ दुख  होते

वैसे ही जीवन में

11

मुझे बचाया

गिरने से उसने,

जो था पराया

आँधियों का शुक्रिया

अपनों  को दिखाया

12

फूल -सी बात

महके  दिन-रात

शूल- सी बात 

तो  चुभ -चुभ जाए

जो पीर पहुँचाए

13

 माने न हार

चोट खाए  सर्प -सा

ये अहंकार

हो के लहूलुहान

करता फ़ुफ़कार

14

तेरा प्रसाद

ये जीवन अनूप

कण- कण में

झलके तेरा रूप

चैतन्य तू अरूप

15

कुछ भी नहीं

निरपेक्ष सृष्टि में

सभी  सापेक्ष

पिता है तो सन्तान

भक्त से भगवान

16

मन को भावें

चापलूसी बतियाँ

वे बातें जो कि

सच  प्रकट करें

वे तो काँटों- सी चुभें

-0-

3-दिलबाग विर्क

1

कितना  सच्चा 

कितना झूठा है तू 

न सोचा कभी 

जब प्यार किया तो 

सब मंजूर किया .

2

देखा जो चाँद

आ गई तेरी याद 

हुआ उदास 

छा गया है अँधेरा 

चाँदनी रात में भी .

3

कुछ न सूझे 

जोगिन हुई रूह 

कैसा ये प्यार 

भुलाया सब कुछ 

बस याद है तू ही 

4

मेरे ये नैन 

छमाछम बरसे 

बादल जैसे 

आया था याद प्रिय 

सँभलता  मैं कैसे ?

-0-

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Responses

  1. वैसे तो सभी रचनाएँ एक से बढ़ कर एक हैं, लेकिन इनने तो बस मन ही जीत लिया

    दूब पे बूँद

    नाज़ुक ज़िन्दगी -सी

    श्यामा तुलसी

    सहमी आँगन में

    देख कैक्टस

    सजता बैठक में

    माने न हार

    चोट खाए सर्प -सा

    ये अहंकार

  2. नन्ही -सी परी
    लिये जादू की छड़ी
    बच्चों को दिए
    खिलौने और टॉफी
    फिर उड़ वो चली!
    जेन्नी शबनम जी का यह ताँका अनोखे भाव से मन मोह गया।

    मुझे बचाया
    गिरने से उसने,
    जो था पराया
    आँधियों का शुक्रिया
    अपनों को दिखाया
    रेखा रोहतगी जी ने बड़ी खूबसूरती से सच बयाँ कर दिया…बधाई…।

    दिलबाग जी के ताँकों में प्रेम की भावना बहुत सटीक ढंग से उभरी है…बधाई…।

  3. नन्ही -सी परी
    लिये जादू की छड़ी
    बच्चों को दिए
    खिलौने और टॉफी
    फिर उड़ वो चली!
    -कितने सुन्दर भाव हैं ! बहुत ही मासूम से
    तारों की छाँव
    लाडली डोली चढ़े
    अँसुवन के
    हरसिंगार झरें
    मन सुगन्ध भरें
    सही लिखा है रेखा जी आपने ।
    मेरे ये नैन
    छमाछम बरसे
    बादल जैसे
    आया था याद प्रिय
    सँभलता मैं कैसे ?
    -दिलबाग़ जी प्रेमरस में ढली सुन्दर अनुभूति ।
    रचना

  4. जेन्नी शबनम जी, रेखा रोहतगी जी और दिलबाग जी के तांका भावपूर्ण हैं और तांका के अनुशासन में कसे हुए। ‘हाइकु’ और ‘तांका’ पर ऐसे ही लोग (खासकर नये लोग) लिखते रहे तो नि:संदेह ये कविता प्रेमियों को बांधने में सफल होंगे और उनके दिलों में अपनी खास जगह बनाएंगे।

  5. सब हाइकु एक से बढ़ कर एक हैं पर कुछ मन को छू गए
    नन्ही -सी परी
    लिये जादू की छड़ी
    बच्चों को दिए
    खिलौने और टॉफी
    फिर उड़ वो चली!
    बहुत सुंदर भाव हैं शबनम जी
    श्यामा तुलसी
    सहमी आँगन में
    देख कैक्टस
    सजता बैठक में
    झरते सावन में
    क्या खूब लिखा है रेखा जी

    कितना सच्चा
    कितना झूठा है तू
    न सोचा कभी
    जब प्यार किया तो
    सब मंजूर किया
    बहुत सुंदर लिखा है दिलबाग जी

  6. taanka likhne la yeh pahla prayas hai, aap sabhi ne ise pasand kiya, tahedil se shukriya. bahut aabhar.


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