Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 20, 2011

ताँका- 3


1- सुभाष नीरव

1

 बरसे मेघ

मन मयूर नाचा

हुआ विभोर

पुलकित हवाएँ

आनंदगीत गाएँ।

2

  श्रम के बल

कामयाबी के ध्वज

जो फहराते

नई इबारत वो

जग में लिख जाते।

3

तृप्त हो मन

मिटाये भूख सारी

बिठा के पास

जब अम्मा परोसे

अपने हाथ रोटी।

4

 बोल न पाये

हँस के जतलाये

अपनी खुशी

बच्चे की किलकारी

लगे बहुत प्यारी।

 गिरना तो है

उठने का अभ्यास

न हो उदास

गिर के उठते जो

शिखरों को छूते वो।

       -0-

2- प्रियंका गुप्ता

1

वो हरा पेड़

 डोलता तो कहता-

 मैं दोस्त तेरा

 काटा मुझे तो तूने

लगा पीठ में छुरा ।

2    

पोपला मुँह

दादी बैठी उदास

चूल्हे के पास

लड्डू-मठ्ठी बाँधती

पोता ले जाए साथ ।

       3

हँसती बेटी

आँगन महकाती

बड़ी हो गई

परदेसी हो गई

बाबुल राह तके ।

-0-

3-डॉ अमिता कौण्डल

1

पिया बिछोह

कंटक  सा -चुभता

दर्द ही देता

कर देता छलनी

ह्रदय विरह में

2

प्रतीक्षा रत

आँखें  तरसें, पिया

आओ जो तुम

सर्दी बने वसंत 

जेठ में हो वरखा  

3

जागे हैं नैन

जब से तुम गए

आँखों के मेघ

वरसें दिन रैन

दिल पाए न चैन

4

भोर है सूनी

प्रीतम तुम बिन

साँझ का सुर

सुनता नहीं अब

रात भी हुई काली

5

चैन भी गया

तुम्हारे संग पिया

व्याकुल  मन

तड़पे हर पल

जल बिन मीन ज्यों

6

माँ का महत्त्व

माँ बनी तो ही जाना

धन्य हुई मैं

बनी जब बिटिया

तभी  माँ बन पाई  

7

माँ ठंडी छाँव 

मन की बातें जाने 

मुख देख के 

और इक मुस्कान 

 हर दुख हर ले

8

सब सहती

‘न’ कभी   न कहती

मुस्कुरा कर

सब  दुःख हरती

ये माँ जो है जननी  

-0-


Responses

  1. कम्बोज भैया, रचना जी और सुधा जी मैं जब भी तांका लिखूंगी सदा आप तीनो को समर्पित होंगे. सुधा जी से मैंने ये विधा सीखी और कम्बोज भैया व् रचना जी के प्रोत्साहन से लिख पाई. मेरे इन तांका को सुभाष जी और प्रिंयका जी जैसे रचनाकारों के साथ हिंदी हाइकु पर स्थान देने के लिए कम्बोज भाईसाहब और डॉ संधू जी आपको हार्दिक धन्यवाद.

    सादर,

    अमिता कौंडल

  2. अमिता जी सभी किसी न किसी से सीखते हैं । मैंने भी भी हिमांशु जी और सुधा जी से सीखें हैं .एक बात कहूँ आपने बहुत अच्छे तांका लिखे हैं
    सुभाष जी आप साहित्य के हर क्षेत्र के माहिर है कहानी कविता सब कुछ .आपके हाइकु मैने पढ़े है। बहुत ही अच्छे हैं और आज तांका क्या बात है कितना सुंदर लिखा है

    तृप्त हो मन
    मिटाये भूख सारी
    बिठा के पास
    जब अम्मा परोसे
    अपने हाथ रोटी।
    बरसे मेघ
    मन मयूर नाचा
    हुआ विभोर
    पुलकित हवाएँ
    आनंदगीत गाएँ।
    ============
    प्रियंका जी
    कितने सुंदर भाव है !आँखों के सामने दृश्य उतर आया,बधाई
    पोपला मुँह
    दादी बैठी उदास
    चूल्हे के पास
    लड्डू-मठ्ठी बाँधती
    पोता ले जाए साथ ।
    -सुन्दर अति सुन्दर
    रचना

  3. अमिता जी,
    इतने सशक्त हस्ताक्षरों के साथ मेरा भी नाम लेने के लिए आभारी हूँ…।
    आदरणीय काम्बोज अंकल के प्रोत्साहन और प्रेरणा से मैने पहले हाइकू लिखने शुरू किए, फिर तांका…। मेरे जैसे बहुत से लोगों ने उन्हीं की बदौलत इस नई सी विधा में अपने हाथ आजमाए हैं…।
    मैं तो हमेशा इस बात के लिए सारा श्रेय उन्हें ही दूँगी, साथ में इस विधा को समर्पित हरदीप जी भी साधुवाद की हक़दार हैं…।
    आभार,
    प्रियंका

  4. अमिता जी और प्रियंका गुप्ता के तांका पढ़कर सुखद अहसास हो रहा है कि तांका में इतना अच्छा लेखन नये रचनाकार कर रहे हैं। मां पर अमिता जी के ये तांका मन को छू गए –

    माँ ठंडी छाँव
    मन की बातें जाने
    मुख देख के
    और इक मुस्कान
    हर दुख हर ले
    0

    सब सहती
    ‘न’ कभी न कहती
    मुस्कुरा कर
    सब दुःख हरती
    ये माँ जो है जननी

    ऐसे ही प्रियंका जी के ये तांका तो ग़ज़ब के हैं-

    पोपला मुँह
    दादी बैठी उदास
    चूल्हे के पास
    लड्डू-मठ्ठी बाँधती
    पोता ले जाए साथ ।
    0
    हँसती बेटी
    आँगन महकाती
    बड़ी हो गई
    परदेसी हो गई
    बाबुल राह तके ।

    आपने जो अलख जगाई है, निश्यय ही और अच्छा काम होगा भविष्य में…

    सुभाष नीरव

  5. अमिता जी आपने जो कहा सच कहा । हिमांशु जी और सुधा जी से हमने जो भी सीखा है उसका कोई मोल नहीं है .
    मैने तो कुछ नहीं किया जो इनसे सीखा वही आपको बताया .आपके इस स्नेह के लिए धन्यवाद
    माँ ठंडी छाँव
    मन की बातें जाने
    मुख देख के
    और इक मुस्कान
    हर दुख हर ले
    0

    सब सहती
    ‘न’ कभी न कहती
    मुस्कुरा कर
    सब दुःख हरती
    ये माँ जो है जननी
    kya baat hai sunder likha hai

    सुभाष जी आप लेखन की कई विधा के स्वामी है आपकी.कहानियाँ पढ़ कर सभी आत्म विभोर हो जाते हैं .
    आप के हाइकु मैने पढ़े हैं; लाजवाब है और आज तो तांका ने कमल ही कर दियां

    तृप्त हो मन
    मिटाये भूख सारी
    बिठा के पास
    जब अम्मा परोसे
    अपने हाथ रोटी।
    sahi kaha hai
    श्रम के बल
    कामयाबी के ध्वज
    जो फहराते
    नई इबारत वो
    जग में लिख जाते।
    ati sunder

    प्रियंका जी
    आपके तांका मन में दृश्य उत्पन कर देते हैं .बहुत सुंदर

    पोपला मुँह
    दादी बैठी उदास
    चूल्हे के पास
    लड्डू-मठ्ठी बाँधती
    पोता ले जाए साथ ।
    3
    हँसती बेटी
    आँगन महकाती
    बड़ी हो गई
    परदेसी हो गई
    बाबुल राह तके ।

    aap tino ko badhai
    mene pahle bhi likha tha pr aaya nahi atan deri ho gai aane me mafi chahungi
    rachana

  6. नीरव जी और रचना जी, आप दोनो की प्रतिक्रियाओं और उत्साहवर्धन के लिए आभारी हूँ…।
    प्रियंका

  7. sabhi tanka khoobsoorat

  8. रचना जी, नीरव जी व् दिलबाग जी आप सब के स्नेह शब्दों के लिए हार्दिक धन्यवाद.
    सादर
    अमिता कौंडल


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