Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 28, 2011

गए वो दिन


१.

गए वो दिन

बदल गए हम

बाण की खाट

न जाने कब -कहाँ

अब हो गई गुम !

२.

गर्मी जो आए

घुंघरू वाली पंखी

अम्मा बनाए

छन-छन घुंघरू

गर्मी दूर  भगाए !

३.

तोड़ उपले

दादी हारे में डाले

आग सुलगे

उर्द की डाल पके

बहुत धीरे -धीरे !

४.

मुन्ना जो गिरा

आई थी चोट उसे

लगा वो रोने

‘चींटी का आटा गिरा’-

कह माँ  पुचकारे !

५.

बच्चे जो बोले

न करो बँटवारा

आँगन छोटा

न दीवार बनाओ

बोलो कहाँ वो खेलें !

६.

शादी के दिन

विवाह वाले घर

जोड़ दो खाट

स्पीकर था लगता

फिर गाना बजता !

७.

बादल छाए

सुनी जो मेघ-ध्वनि

अम्मा न रुके

चूल्हे – हारे सँभाल

उपले सब ढके !

८.

जब-जब भी

लगे तेल सरसों

नानी के बाल

यूँ चमकते जैसे

 हों सोने के वे तार !

९.

माँ के हाथों

कढ़ाई वो चादर

जब बिछाऊं

लगता मुझे ऐसे

माँ का परस पाऊँ !

१०.

श्रावण मास

मुझे वो याद आए

माँ की रसोई

गुलगुले पकाए

खुशबू मन भाए !

-0-

डॉ हरदीप सन्धु

                                                                                                                                        


Responses

  1. बच्चों के रोने पर कई बार- चींटी मर गई’ या ‘चींटी का आटा गिरा’- कह कर चुप कराना शायद हर भारतीय माँ को आता है । बड़ी खूबसूरती से इन ताँकों में अपनी मिट्टी से जुड़ी बातों को आपने पिरोया है हरदीप जी…मेरी बधाई।

  2. gramin rang men range sunder tanka

  3. हरदीप जी, आपके ये ताँके आपके हाइकुओं की तरह इसलिए अधिक असरदार और मन को छूने वाले लगे क्योंकि इनमें हमारे पुराने समय और उस समय से जुड़ी यादों के, आज प्राय: गुम हो गए, बहुत ही खूबसूरत शब्द बड़ी ही कलात्मकता के साथ गुंथकर सामने आए हैं- जैसे ‘बाण की खाट’, ‘घुंघरू वाली पंखी’, ‘हारे’, चींटी का आटा गिरना’, ‘उपले’ आदि। इनके इतने सुन्दर प्रयोग से आपके ये ताँके तो जीवंत हो ही उठे हैं और आपके इन ताँकों की वजह से ये पुरानी वस्तुएं, ये पुराने शब्द भी जीवंत हो उठे हैं। बहुत बहुत बधाई। मेरी भाई काम्बोज जी से इस विषय में बात हो रही थी। उनका कहना था कि “ताँका” पहले आया, हाइकु बाद में। पर मुझे लगता है कि “ताँका” “हाइकु” का ही विस्तार है, पर श्रेष्ठ “ताँका” शायद वह है जिसमें पहली तीन पंक्तियाँ(5+7+5) हाइकु भी हों। यदि अन्तिम दो पंक्तियाँ (7+7) हटा दें तो वह अपने आपमें हाइकु हो, अन्तिम दो पंक्तियाँ जोड़ दें तो वह श्रेष्ठ “ताँका” बन जाए। खैर मैं तो अभी इस क्षेत्र में नौसिखिया ही हूँ, सीखने की प्रक्रिया में हूँ, हो सकता है, मेरी बात सही न हो…लेकिन मेरा मानना है कि ऐसे “ताँका” लिखे जाने चाहिए और अच्छे और उत्तम “ताँकों” को सामने भी आना चाहिए।

  4. वह उस समय होता था जब तांका को दरबारों में एकाधिक लोग लिखते थे । अब हम अकेले लिखते हैं तो अलग-अलग होना सम्भव भी नहीं और होता भी नहीं । उसका विषय दरबारी या धार्मिक होता था । पहली तीन पंक्तियों के आधार पर बाद की दो पंक्तियाँ यानी 7+7 और फिर इसके आधार पर फिर 5+7+5 यह क्रम सौ तक भी चलता था और वह कहलाता था रेंगा । अब क्योंकि तांका स्वतन्त्र लिखा जाता है अत: उसके दो भाग नहीं हो सकते । अब यह दरबारी प्रक्रिया या समूह का शृंखलाबद्ध रचनाकर्म नहीं है ।यह अपने आप में एक ही है और पूरी तरह से कम्पैक्ट । लिखा जा रहा है बरसों से ,लेकिन कम ।
    काम्बोज

  5. क्या बात है हरदीप जी,

    बहुत उम्दा बहुत खूबसूरत…ग्राम्य जीवन की यादें तरोताजा हो गईं …आप ताँका लिखने में भी सिद्धहस्त हैं …हमारी हार्दिक शुभकामनाएं स्वीकार करें….

  6. sare tanka bahut sunder hai jamin se jude .sondhi sondhi khushbu dete man aangan me aayadon ke ful khilate
    bahut sunder badhai
    rachana


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