Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 19, 2011

मुखौटों का दौर


 1.

         गलतियाँ कीं

         फिर पछताए हैं 

         न सीखा कभी !

2.

         आदमी रोज़ 

         बदलता है रूप 

         जैसे कि चाँद !

3.


          सोच -सँभल ;

          मुखौटों के दौर में 

          धोखे बहुत !

4.


          बुरा वो कृत्य 

          करना जो पड़ता

          चोरी  – चुपके !

5.


          सांप को दूध 

          गरीब को ठोकर 

          देखो दुनिया !


             * * * * *

दिलबाग विर्क


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Responses

  1. आदमी रोज़
    बदलता है रूप
    जैसे कि चाँद !

    सांप को दूध
    गरीब को ठोकर
    देखो दुनिया !

    जीवन के कड़वे सच को प्रस्तुत करते हाइकु के लिए बधाई…।

  2. आदमी रोज़ / बदलता है रूप / जैसे कि चाँद !
    सोच -सँभल ; / मुखौटों के दौर में / धोखे बहुत !

    जीवन का सार अत्यन्त सरलता से व्यक्त हुआ है इन पंक्तियों में…सभी हाइकू बहुत सुन्दर हैं …


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