Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 13, 2011

हँसते खेत


1

हँसते खेत

दूर-दूर तलक

खुश सीवान

2

शीश डुलाएँ

वधू-पकी बालियाँ

चढ़ी है मस्ती

3

नाचें गबरू

कटे जब फ़सल

बजती चंग

4

चाँदनी रातें

झूमते खलिहान

गूँजते गान

5

ढोल की थाप

भाँगड़ा भरे जोश

फड़कें बाँहें

-0-

रामेश्वर काम्बोज’हिमांशु’

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Responses

  1. वैशाखी पर्व के बहाने आपने हाइकु के माध्यम से जो चित्र खींचे हैं वे सभी जीवन्त लगते हैं। सोने जैसी पकी फ़सल को देख कर जो मस्ती और उमंग का संचार होता है, वह इन हाइकुओं में स्प्ष्ट झलक रहा है। बधाई !

  2. ढोल की थाप
    भाँगड़ा भरे जोश
    फड़कें बाँहें—–wah
    behad khoobsorat haaiku,punjabi rang lie hue
    aai baisakhi-haaiku

  3. वैशाखी का पर्व मानो आँखों के सामने साकार हो गया…।
    वैशाखी की हार्दिक शुभकामनाएँ…।

  4. हिमांशु जी,
    बहुत खूबसूरत एवं सजीव शब्द चित्र खीचे हैं …दिल को छू गए । वैशाखी की अनेकानेक मंगलकामनाएं……

  5. बेहतर…

  6. ढोल की थाप
    भाँगड़ा भरे जोश
    फड़कें बाँहें
    kitna sunder chitran hai .madh ke man maur nrity karne laga
    bahut bahut badhai
    saader
    rachana


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