Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 11, 2011

यादों में लिपटी


1

सब अपने,

लगते अजनबी

कौन अपना ?

2

टँके सितारे

सज गई संध्या की

नीली चूनर।

3

माँ इस छुट्टी

पापा से कहो,चलें

दादी के गाँव।

4

अर्थ- व्यवस्था

मज़बूती की ओर

मरे किसान।

5

महान दिल्ली

निडर बलात्कारी

भयभीत स्त्री।

6

काली कमाई

चढ़ा दिया प्रसाद

हुए निश्चिंत।

7

साथ तुम्हारा

ज़िन्दगी की धूप में

शीतल छाया।

8

मामूली बात

भड़के जो जज़्बात

हुआ हादसा।

9

दो अनजाने

साथ थे संयोग से

जीवन भर।

10

ढेरों सपने

ले के आया था; किंतु

खोया भीड़ में।

11

दर्द अपना

बयाँ कर तुम से

पाया सुकून।

12

तुमसे दूर

यादों में लिपटी मैं

साथ तुम्हारे।

13

खुश है झूठ

लटकी तलवार

सच के गले।

14

प्यारा मौसम

बहार ही बहार

पर तू नहीं।

15

बिखर गया

जीवन की साँझ में

उदास फूल।

-0-

ममता किरण


Responses

  1. महान दिल्ली
    निडर बलात्कारी
    भयभीत स्त्री।
    akele dehli men nhin ye sthiti to poore desh men hai

    sunder haaiku
    sahitya surbhi

  2. ममता किरण जी के हाइकु प्रभावित करने में सक्षम हैं। आज महानगर दिल्ली में स्त्री का जो हाल है, उस सच को व्यक्त करता यह हाइकु – ‘महान दिल्ली/निडर बलात्कारी/भयभीत स्त्री’ कितना प्रासंगिक और सटीक लगता है।
    टँके सितारे
    सज गई संध्या की
    नीली चूनर।
    उक्त हाइकु में संध्या का बहुत ही सुन्दर दृश्य खींचने में ममता जी सफल हुई हैं।
    माँ इस छुट्टी
    पापा से कहो,चलें
    दादी के गाँव।
    यह हाइकु तो हम सबका अपना हाइकु लगता है।
    बधाई !

  3. साथ तुम्हारा, ज़िन्दगी की धूप में, शीतल छाया।
    ढेरों सपने, ले के आया था; किंतु, खोया भीड़ में।
    इन दोनो हाइकुओं के लिये आभार


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