Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 16, 2011

वसन्त-प्रेम


इस अंक में होली , वसन्त और प्रेम की  त्रिवेणी में सभी  में डुबकी लगाकर आनन्द -विभोर होंगे !इस अंक में 18 हाइकुकारों के 141 हाइकु दिए जा रहे हैं

हिन्दी -हाइकु के रचनाकारों और पाठकों को होली के रंग और वसन्त के बहुरंगी रूप का स्वागत करते हुए झोली भर-भर बधाई !

डॉ हरदीप कौर सन्धु , रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

वसन्त -प्रेम

1

फूलों की पाग

बाँधी पेड़-पौधों ने

सजी बारात

2

तपे लोहे-से

आम के नए पत्ते

उकसा गए

3

किशोरी डाल

किसलय लपेटे

शर्म से लाल

4

फूलों की टोपी

हरियाली का कुर्त्ता

वसन्त दूल्हा

5

अनार -झाड़ी

लाल फूलों से भरी

लाज से झुकी

6

शोख़ बोलियाँ

हवा में ठुनकती

बुलबुल की

7

चैरी का पेड़

पीताभ औ’ गुलाबी

फूलों से सजा

8

दहक उठी

बुरूँश -पोरों पर

चिनगारियाँ

9

चिनार -पत्ते

कहाँ पाई ये आग

बता तो भला !

10

नीचे घाटी में

डैफ़ोदिल खिले हैं

दीये जले हैं!

11

बोगनबिला

किसने मसले गाल

कौन था मिला?

12

फूटी कोंपल

अंजीर के पेड़ में

कूका ‘बसन्ता’

13

नाचती हवा

डफली बजाता है

प्रेमी महुआ

14

बाँसों के वन

मनचली हवा ने

बजाई सीटी

15

‘वधू’ बहार

फूल-पालकी लाया

‘वर’-वसन्त

16

फूलों की राखी

सजाके कलाई में

घूमे वसन्त ।

17

कूकी जो पिकी

‘छ्न्न’ दोपहरिया

काँच-सी टूटी ।

18

कोयल गाती

हरी आम की शाख़

आग लगाती ।

डॉ सुधा गुप्ता

-0-

1

नटखट -सी

चंचला,लुभावनी

ऋतु बसन्त ।

2

मौसम आया

फूलों पे खिले रंग

खुशियाँ लाया।

3

दुल्हन बनी

पृथ्वी रानी,पहने

फूलों के हार।

4

झूमती जाये

मदमस्त सी हवा

किस दिशा में ?

5

रंग -बिरंगे

खेत जो लहराएँ

आनन्दित से।

6

नाचती-गाती

झूमती शाखाओं पे

खिला यौवन।

7

झूमती डाल

चहचहाते पंछी

मदमस्त से ।

8

खेत है वधू

सरसों हैं गहने

स्वर्ण के जैसे ।

9

रंग -बिरंगी

तितलियों का दल

झूमता फिरे ।

10

लदी हुई है

रसभरे फलों से

पेड़ों की डाली ।

11

भँवरा झूमा

पीकर मकरन्द

मदमस्त -सा।

12

चिड़ियाँ गातीं

घंटियाँ मन्दिर की

गीत सुनातीं।

13

मधुर गीत

बुलबुल जो गाये

मन लुभाए।

14

चमकती थी

दुल्हन की तरह

चाँदनी रात ।

15

चम्पा चमेली

महकाए हुए हैं

घर -आँगन।

16

आसमान में

दूधिया -सा चन्द्रमा

चमक रहा।

17

नहीं भाता है

पतझर किसी को

भाये बंसत ।

18

नदियाँ गातीं

लहरों के साथ में

रास रचातीं।

-डॉ भावना कुँअर

1

छाया वसंत

सज गई धरती

उमड़ी प्रीत

2

तन झाँझर

संगीत बनी धरा

मन मयूर

3

उम्र बहकी

जोड़ लिया मन ने

संगी से नाता

4

आकाशी पेड़

हरी भरी धरती

सूर्य पाहुना

5

हो  हर दिन,

सौगातें साथ लिये

वसंत आए

-0-

मंजु मिश्रा

प्रेम-रस

1

शब्दों के मोती
बँधी भावों की डोर
ओर न छोर

2

मैं रहूँ कहीं
तुमसे मेरी पीर
ना जाए सही।
3

तेरे आशीष
फूल बन बरसे
भरा दामन।
4
नेह -बंधन
ज्यों मन गगन में
चंदा रोशन ।
5
तेरी दुआएँ
जीवन के मरु में
ठंडी  हवाएँ।

6

मन पंछिड़ा
उड़ने को व्याकुल
तन पिंजड़ा।

7

तन पिंजड़ा।
मेरे संग चले ना
राहें मुश्किल।

8

राहों में जले
तेरे नेह का दिया
रोशन जहाँ

9
भरती रही
बूँद-बूँद नेह से
जीवन घट।

-0-

-कमला निखुर्पा, देहरादून

1

प्यार की प्यास

दहकता पलाश

बसंत साथ ।

2

महुआ फूला

मादक  भरी   गंध

ॠतु प्यार की।

3

उगती धूप

गुनगुनाती धरा

आया वसंत ।

-0-

डा.रमा द्विवेदी

हैदराबाद (आं. प्र.)

1

रूप -यौवन

खिले पलाश-वन

उमगा मन

2

आया वसन्त

सरसाई सरसों

झूमे दिगन्त

3

चाँदनी रात

चन्द्रमा करे बात

भीगते गात

-0-

– एन एल गोसाईं,फ़रीदाबाद

1

गयी है पिकी

प्रतीक्षारता पुन

आम्र शाखाएँ।

2

बजाने आयी

पिकी छिप बाँसुरी

अमराई में।

3

फूल खिलता

महक मुरझाता

सपन बनता।

4

आये कोकिल

धुन वंशी की गूँजे

बौर महकें ।

-0-

डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव ,लखनऊ

1
सजनी-संग
सपने होगी होली –
सैनिक सोचे
2
कब आया था
सीमा  पर बसंत
पता न चला !
3
सरसों फूले
महुआ गिरे बाग
बसंत आया
-0-
रचना श्रीवास्तव

1

वसन्त है आया

धरती ने बदली

अपनी काया

2

कूकी कोयल

तभी हो गया तय

आया वसन्त

-सतीशराज पुष्करणा

1

आते वसन्त

रंग-बिरंगे पेड़

लगते सन्त

2

खिड़की खोलो

मधुमास की हवा

देती दस्तक

3

उगते पात

देख मधुमास को

हँसते गात

-राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’

1

मधु ॠतु में

यौवन इठलाता

सपने जगाता

-सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

-0-

1

बहका मन

फगुनाया मौसम

आ जाओ पिया

2

पगला गई

है वासन्ती बयार

तुम न आए

3

वैरागी मन

उसे देख बौराया

साधना टूटी

-डॉ उर्मिला अग्रवाल

-0-

1

फूली सरसों

खेतों में देखे बिन

बीते बरसों

2

प्रकृति सजी

हवाएँ झूम उठी

बाँसुरी बजी

डॉ गोपाल बाबू शर्मा

1

ऋतुराज ये

सुहावना मौसम
आया वसंत !
2

चारों ओर है
उत्सव राग-रंग
आया वसंत
3

किरणें ओढ़
सोने-सी सुनहरी
आया वसंत !
4

आया वसन्त

मन की घुटन का

हुआ न अन्त

5

आया वसन्त

बरस बीत गए

लौटे न कन्त

6

आया वसन्त

प्रतीक्षा की घड़ी का

हुआ न अन्त

7

रूठा वसन्त

भेजी न पाती कोई

न नए पात

8

डाली महकी

सुरभि के पान से

गली बहकी

-0-

डॉ हरदीप सन्धु

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Responses

  1. बहुत सुन्दर और शानदार लगा हाइकु! उम्दा प्रस्तुती!

  2. आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

  3. shaandar haaiku

  4. basant ki tarah kusmit har ek pankti.
    maousam ki mahak liye naye hayku.
    sabhi ko badhai
    rachana

  5. डाली महकी
    सुरभि के पान से
    गली बहकी
    bahut khoobsoorat…meri badhayi…

  6. कूकी कोयल
    तभी हो गया तय
    आया वसन्त
    पुष्करणा जी ने बसन्त का खाका सा खींच दिया…मेरी बधाई…।

  7. Waah mahkte hue haiku sanson mein bahar le aaye
    aap ko aur samast parivaar ko Holi ki shubhkamnayein

  8. कूकी कोयल
    तभी हो गया तय
    आया वसन्त
    पुष्करणा जी ने बसन्त का खाका सा खींच दिया
    बधाई।

  9. ‘वसन्त प्रेम’ अंक के सभी हाइकुओं ने वसंत रंग से सराबोर कर दिया ….हाइकु परिवार को हमारी अनन्त शुभकामनाएँ…..
    संकलन बहुत सराहनीय और सार्थक है। हिमांशु जी एवं डा.हरदीप जी का विशेष हार्दिक आभार एवं शुभकामनाएँ …

  10. बहुत बहुत सुन्दर .. रंग बिरंगी प्यारी रचना.,. !

    सभी आदरणीय रचनाकारों को हार्दिक बधाई !


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