Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 6, 2011

रस उमड़ा


1

दूधिया हँसी
खिला चाँद -चेहरा
फूल लजाए।
2

धानी आँचल
लहराया धरा ने
रस उमड़ा।

3

भीगी पलकें
नयनों के प्याले में
सिन्धु छ्लके ।
4

मन- बगिया
तन फूलों का हार
महका प्यार।
5

मन का सीप
पुकारे बादल को
मोती बरसे।

6

रातों ने ओढ़ी
कोहरे की चूनर
चाँद ठिठुरा ।
7

बर्फ़ पिघली
कल -कल बही है
पहाड़ी नदी ।
8

मन- कमल
पंखुड़ियाँ कोमल
मुरझाएँ ना ।
9

कान्हा बसंत
राधारानी -अवनि
फूल महके ।

-0-

कमला निखुर्पा


Responses

  1. भीगी पलकें
    नयनों के प्याले में
    सिन्धु छ्लके ।
    4
    मन- बगिया
    तन फूलों का हार
    महका प्यार।
    वाह! बहुत सुन्दर। कमला जी के सभी हाइकु बहुत अच्छे लगे। उन्हें बधाई।

  2. बर्फ़ पिघली
    कल -कल बही है
    पहाड़ी नदी ।
    यहाँ भी बर्फ़ पिंघल रही है । पहाड़ी नदी में बहता पानी बहुत सुन्दर लिखा है ।

    भीगी पलकें
    नयनों के प्याले में
    सिन्धु छ्लके ।
    बहुत खूब
    धानी आँचल
    लहराया धरा ने
    रस उमड़ा।
    मनोरम
    बधाई
    सादर
    रचना

  3. सभी हाइकु सुंदर हैं…..

  4. भीगी पलकें
    नयनों के प्याले में
    सिन्धु छ्लके ।

    बर्फ़ पिघली
    कल -कल बही है
    पहाड़ी नदी ।

    सुन्दर , भावमयी हाइकु .. सादर

  5. भीगी पलकें
    नयनों के प्याले में
    सिन्धु छ्लके ।
    -0-
    मन- बगिया
    तन फूलों का हार
    महका प्यार।
    -0-
    मन का सीप
    पुकारे बादल को
    मोती बरसे।
    -नयनों के प्याले में भावातिरेक के कारण सिन्धु का छलकना ,मन की बगिया में तन का फूलों का हार बनकर महकना ,मन का सीप जब एक पुकार बन जाता है तो मोती बरसते ही हैं – कमला निखुर्पा के ये हाइकु गहरे भावों से सराबोर हैं । यही इनके बेजोड़ होने का आधार है । इस तरह के हाइकु इस विधा के लिए सम्मानजनक स्थान बनाने में सहायक होंगे ।

  6. भीगी पलकें
    नयनों के प्याले में
    सिन्धु छ्लके

    बहुत खूब… नयनों के प्याले में सिन्धु अभिनव कल्पना …


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