Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 9, 2011

कोहरे की बाहों में-2


1- घना कोहरा
सफ़ेद चादर-सा
धरा ने ओढ़ा ।
2- धूप निकली
कोहरे की चादर
सूखने डालो ।
3- दुःख-कोहरा
निराशा की बदली
दूर तो होगी ।
4- सूरज रोज
आँख-मिचौली खेले
कोहरे संग ।

-0-
-प्रियंका गुप्ता


Responses

  1. बहुत ही सुन्दर हाइकु….
    वाह !
    क्या कितने सुन्दर शब्दो में तुलना की है , कोहरे की….
    यह चाहे धरा पर हो या दु:ख का ….
    सूर्य (आशा) के आगे नहीं टिकता ।

    दु:ख कोहरा
    पिघलने लगता
    मन में आशा !

  2. धूप निकली
    कोहरे की चादर
    सूखने डालो ….

    Superb !!

  3. बहुत सुन्दर लगे आपके हाइकु !

  4. आप सब की सुन्दर और उत्साहवर्धक टिप्पणियों के लिए आभारी हूँ…।


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