Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 20, 2010

फैली चाँदनी


1-लोप हो गए

लाज-धर्म बना था

झूठ प्रधान

2- घना अँधेरा

जब फैला जग में

उतरा चाँद ।

3-मिटा अँधेरा

हर कोने में तब

फैली चाँदनी ।

4-ओंकार एक

सतनाम , निर्भय

कर्त्ता , निर्वैर ।

5-अकाल मूर्त्ति

जन्म -मरण नहीं

स्वयं प्रकाश ।

6-सबमें ज्योति,

ज्योति वही ईश्वर

वही चाँदनी ।

7-मन का मैल

न निकले जब लौं

निर्मल कैसे ?

 

8-अमृत सींच

जो भरता क्यारियाँ

वो माली  होता ।

9–जो -जो दुर्गुण

उतनी हैं जंजीरें

पड़ी गले में ।

-0-

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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Responses

  1. सच है दुर्गुण गले में पड़ी जंजीरे ही तो हैं…………
    जो गुनाह की राह की ओर खींचती है।

    चुपके से जो किया इक गुनाह ,
    बेगुनाही भी छुप के शर्माई तो होगी।
    गुनाह हंसा होगा गैरतमंद बनकर,
    बेगुनाही अपनी बेकद्री पे रोई तो होगी।


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