Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 4, 2010

दीपावली हाइकु विशेषांक-1


दीये की कहानी एक तरह से पूरी विश्व सभ्यता की कहानी है । नन्हा-सा दीया मानव -जागरण की कहानी कहता है । बाहरी अन्धकार के विनाश और आन्तरिक प्रकाश के लिए मानव निरन्तर प्रयासरत रहा है । सद्वृत्तियो को जाग्रत करना ही सच्ची दीपावली है ।इस अवसर पर हमने एक साथ नए -पुराने हाइकुकारों को जोड़ने का प्रयास किया है । आशा है आपको हमारा यह प्रयास पसन्द आएगा । सम्पादक  द्वय

1-डॉ भावना कुँअर के हाइकु

1-मनी दीवाली
बाग-बगीचों में भी
जुगनू संग ।

2- रखती रही
अँधेरी अटारों पे
रोशनी मोती ।

3-दौड़ता रहा
रात भर अँधेरा
देख चाँदनी

4- दीप कतारें
चमकीले सितारे
अँधेरा हारे ।

5- दीये सजाओ
दूर करो सारा ही
ये अँधियारा ।

6- चाँद बेचारा
देख दीपशिखायें
मुँह छुपाये ।

-0-


2-रामेश्वर काम्बोज के हाइकु

1-किलोंले करे

दीप -शिखा आँगन

उजाला भरे ।

2-नदिया भरे

धरा से नभ तक

उजाला बहे ।

3-अजाना पथ

बढ़े चलो दीप ले

अपना रथ ।

4- दीपक नहीं

छिटकी धरा पर

शिशु की हँसी ।

5- आँधियां चलें

देख निष्कम्प दीप

पथ से टलें ।

6- दीप प्रेम का

हर घर में जले

अँधेरा टले ।

7- स्नेह से भरो

उर- दीप को

उज्ज्वल करो।

8- आँधियों का क्या

बुझाएँगी वे दीप ,

हमें जलाना ।

9-अँधेरे हटा

उगाएँगे सूरज

हर आँगन।

-0-

3- प्रियंका गुप्ता

1मन के दिए

भावनाओं की बाती

होती दीवाली

2- रौशन करें

दीवाली वहाँ पर

जहाँ दिए।

3- आँधियों में भी

लड़ता मुश्किलों से

नन्हा -सा दिया


-0-

4- डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव

आलोकवाही

ज्योति जागरण की

भरो धरा में

0

ज्योति जगाओ

ज्योति-पुरुष तुम

मिटे तमस ।

( ‘चिन्तन के विविध क्षण’-हाइकु-संग्रह से )

-0-

5–हारून  रशीद ‘अश्क’ पटना

1-बेटी, दीपक

जलता पल-पल

कैसा निर्मल ।

2- कैसे जलती

दीप -शिखा-सी वह

इस दिल में।

-हारून  रशीद ‘अश्क’ पटना

(‘जाग गई है शाम’ -हाइकु संग्रह से )

-0-

6 -उमेश मोहन धवन

1-दीवाली पर

हम तुम अपने

भेद भुलाएँ ।

2-ठेस रहे न

द्वेष रहे न ऐसे

दीप जलाएँ ।

3-दीवाली तब

जब प्रकाश फैले

भीतर तक ।

4-तुम आओ तो

पूरे साल दिवाली

वरना काली

-0-

7- कमला निखुर्पा

1-आएँगे राम

होगा रामराज भी

दीप तो जला ।

2-आबाद होगा

निर्जन वनवास

मीत तो बना ।

जलेगी लंका

सेतुबंधन होगा

वाण तो चला ।

3-दीप ने थामी

लौ की तलवार तो

भागा अँधेरा ।

4-सजे बाजार

महके घर द्वार

दीप त्योहार ।

5-माँग में तारे

थामे हाथों में दीप

रजनी वधू ।

6-वंदनवार

झूले फ़ूलों के हार

दीप त्योहार ।

-०-

8-डॉ मिथिलेशकुमारी मिश्र ,पटना

1-

उसका बुझा

हर दीपक जला

जो खेला जुआ ।

2

-मिट्टी के नहीं

ज्ञान के दीप जला

दिवाली मना ।

3-

कैसी दिवाली

दीपक की जगह

बिजली ने ली ।

4-

मिलके जलें

जुगनूँ मिटा देंगे

सारा अँधेरा ।

5-

राह दिखाती

अँधेरी राह में

दीपों की माला ।

6-

पोथियाँ पढ़

नित दिवाली मना

ज्ञानदीप से ।

7-

रोज़ ही मिटा

जीवन का अँधेरा

दीवाली मना ।

8-

नन्हें दीपक

मिटाते अमावस

दिवाली रात

9-

दीपक जलाओ

कैसा भी हो अँधेरा

मिट जाएगा ।

10-

ज्ञान का दीप

मिटाते जीवना का

सब अँधेरा ।

-0-



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Responses

  1. रखती रही
    अँधेरी अटारों पे
    रोशनी मोती ।
    -डॉ भावना कुँअर के पास सशक्त भाषा ही नहीं , उर्वर कल्पना भी है ।इस हाइकु में दीपकों के लिए मोती का उपमान नया और सारगर्भित है । इनके हाइकु एक सार्थक बिम्ब प्रस्तुत करने में सक्षम हैं
    माँग में तारे
    थामे हाथों में दीप
    रजनी वधू ।
    कमला निखुर्पा ने हाइकु के अल्प शब्दों में मानवीकरण तो प्रस्तुत किया ही साथी ही रजनी वधू के रूप को भी साकार कर दिया है ।
    प्राणहीन विचार-संकुल हाइकु लिखने वालों की भीड से हटकर ,ये दो कवयित्रियाँ सार्थक और संवेदनापूर्ण हाइकु का सर्जन करके इस आन्दोलन को सही दिशा की ओर ले जा रही हैं

  2. मिलके जलें
    जुगनूँ मिटा देंगे
    सारा अँधेरा

    चंद शब्दों में बहुत बड़ी बात….. एकता में बड़ी शक्ति है… जुगनू भी अगर एकजुट हो ठान लें तो अँधेरे को ठौर नहीं ढूँढ़े मिलेगा

  3. bahut badhiya


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