Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 28, 2010

हाइकु क्या है ?


हाइकु अनुभूति के सहज उन्मेष की कविता

डॉ सत्यभूषण वर्मा (जापानी भाषा विभाग)*

हाइकु अनुभूति के सहज उन्मेष की कविता है । यह एक भाव या स्थिति के सौन्दर्यानुभूति-जन्य चरम क्षण की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति की कविता है, जिसका विकास जापान में बौद्ध-चिन्तन के जेन दर्शन की पृष्ठभूमि में हुआ है। शैली की दृष्टि से यह 5-7-5 वर्णक्रम में तीन पंक्तियों की सतरह अक्षरी [ वर्ण ] अतुकान्त कविता है । प्रकृति ,हाइकु का प्राण है। ॠतु का हाइकु के साथ गहरा सम्बन्ध है ।ॠतुबोधक पद का प्रयोग और 5-7-5 वर्णक्रम में 17 अक्षर हाइकु के प्रमुख लक्षण माने गए हैं । कथ्य और शिल्प की सादगी , अभिव्यक्ति की सहजता , शब्दों की मितव्ययता , चराचर जगत्  के प्रति संवेदनात्मक  तादात्मय  और वर्ण्य वस्तु के प्रति निर्वैयक्तिक दृष्टि हाइकु के विशिष्ट गुण हैं।

हाइकु कवि  वस्तु को यथावत् चित्रित करता है ,एक प्रकार की अपरोक्ष ॠजुता के साथ ।जो वस्तु जैसी है , उसे वैसा ही चित्रित करना, बिना किसी अलंकार या टिप्पणी के , हाइकु की स्वभावगत विशेषता कही जा सकती है । हाइकु कवि बिम्ब उभारता है , अनुभूति को मुखर करता है ; व्याख्या नहीं देता । हाइकु शुद्ध अनुभूति की ,सूक्ष्म संवेगों की अभिव्यक्ति की कविता है । दार्शनिक दृष्टि से हाइकु सांकेतिक  शब्दावली में जीवन के किसी महान् सत्य का उद्घाटन करता है। जापानी कवि बाशो के अनुसार -श्रेष्ठ हाइकु वह है, जिसमें सृष्टि के रहस्यों पर अन्तर्दृन्ष्टिजन्य क्षणों की स्वत:स्फूर्त अभिव्यक्ति हो । हाइकु कवि  प्रकृति के माध्यम से जीवन -सत्य को देखता है । प्रकृति  के प्रति हाइकु कवि की भावात्मक अनुरक्ति  अनेक रूपों में प्रस्फुटित  होती है । प्राय: हाइकु की एक पंक्ति में ॠतु का उल्लेख होता है । यह उल्लेख कथन द्वारा भी हो सकता है और सांकेतिक प्रतीक द्वारा भी ।

अनुभूति के चरम क्षण की अवधि एक निमिष, एक पल , अथवा एक प्रश्वास की भी हो सकती है  , अत: अभिव्यक्ति की सीमा उतने ही शब्दों तक है ,जो उस अनुभूत  क्षण को उतार पाने के लिए आवश्यक है। उससे अधिक एक भी शब्द व्यर्थ होगा । जापानी में यह  सीमा 17 अक्षरों( वर्णों)  की मानी गई है , जिसमें पहली पंक्ति में 5 , दूसरी पंक्ति में 7 और तीसरी पंक्ति में 5 पुन: 5 अक्षर (वर्ण)  होते हैं । जापानी के स्वरान्त लिप्याक्षरों में 5-7-5 का यह क्रम -विधान भाषा में एक सहज प्रवाह और लहरों का-सा प्रभाव उत्पन्न करता है , साथ ही कविता की तीन पंक्तियों में एक सन्तुलन ला देता है । आकारगत  लघुता  हाइकु का गुण भी है और यही उसकी सीमा भी ।हाइकु में केवल भाव -संयम ही नहीं , वाक्-संयम भी अनिवार्य है ।हाइकु में तुक का महत्त्व नही, पर स्वर- अनुरूपता , अनुप्रास , लय और यति ( विराम चिह्न) पर विशेष बल है ।

हिन्दी  कविता ने मूल हाइकु की लघुता  और संक्षिप्तता को अपनाया है ,पर  वस्तुबोध उसका अपना है  । इसे अस्वीकार करना न तो सम्भव होगा न उचित ही । व्यंग्य , हाइकु -विषय नहीं रहा है  । हिन्दी में व्यंग्य हाइकु का एक मुख्य स्वर है । जापानी में 5-7-5 वर्ण-क्रम में  17 अक्षरी व्यंग्य प्रधान रचना  या पैरोडी एक  अलग  ‘सेन् र् यू’ से अभिहित हुई है । ॠतुबोधक  पद का प्रयोग  जापान की संस्कृति  और  परम्परा से जुड़ा  हुआ है ।ऐसी परम्परा के अभाव में हिन्दी  हाइकु में ॠतुबोधक  पद का  बन्धन  अनावश्यक  हो जाता है । भावबोध हिन्दी का अपना ही होता है । छन्द -विधान में भी हिन्दी प्रकृति के अनुसार तीनों पंक्तियों  के परस्पर अनुपात की सीमा के भीतर प्रयोग हो सकते हैं  और हुए भी हैं  पर हाइकु की पहचान  बनाए रखने के लिए  हाइकु के मूल स्वरूप और शिल्प  को उसी रूप में अपनाना  आवश्यक होगा अन्यथा  जो कविता लिखी जाएगी उसे हाइकु ही क्यों कहा जाए …? केवल एक सूत्र वाक्य  या शब्द-क्रीड़ा  से रचित  किसी भी 17 अक्षरी तीन पंक्तियों वाली रचना को ‘हाइकु’ की संज्ञा नहीं दी जा सकती। हाइकु की तीन पंक्तियों में प्रत्येक पंक्तियों में प्रत्येक पंक्ति की स्वतन्त्र सार्थकता आवश्यक है ।

(मालवी हाइकु : डॉ सतीश दुबे, की भूमिका  से साभार )

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* स्वगीय डॉ सत्यभूषण वर्मा (जापानी भाषा विभाग) ,अफ़्रीकी-एशियाई भाषा  अध्ययन केन्द्र जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में कार्यरत रहे हैं ।

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Responses

  1. धन्यवाद कि आपने इस शैली/छंद पर प्रकाश डाला. आभार….


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