1868

अनिता मंडा

 1

जा मिली धूप

साँझ के आलिंगन

मिटी थकन।

2

दुख ने फिर
चिलम सुलगाई
साँझ बिताई

3

शब्दों का खेल
अधरों पर मधु
मन में मैल।

4

डूबा सूरज
रेत के सागर में
थार की साँझ ।

5

हुआ है नम
भीगकर ओस से
थार का मन।

6

थार की रातें
तारों से जगमग
वीरान राहें।

7

हवा उकेरे
रेत पर माँडनें
सजाए धोरे।

8

रोहिड़ा-पुष्प
बिराग धरे मन
खिले थार में।

9

थार का जोगी
पहने केसरिया
रुँख रोहिड़ा

10

थार को लाँघ
ढल गया सूरज
रक्तिम नभ

-0-

 

 

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